Wednesday, 11 June 2008

o mere shaah-e-Kuubaa.n

Hakim Momin Khan Momin wrote "tum mere paas hote ho goyaa, jab ko_ii duusaraa nahii.n hotaa". Mirza Ghalib famously remarked, "Give this sher to me and take my whole diiwaan".

Hasrat Jaipuri's song in "Love in Tokyo" (1966), o mere shaah-e-Kuubaa.n is clearly inspired by Momin's Ghazal

1 comment:

avinash said...

इंटरनेट का मोहल्ला: वो शायरी, ये गीत और हम हिंदी के लोग
अविनाश

हकीम मोमिन खां मोमिन का एक मशहूर शेर है, `तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता!´ ग़ालिब कहते थे कि मोमिन साहब ये एक शेर उन्हें दे दें और उनका पूरा दीवान उनसे ले लें। ये शेर और ग़ालिब का ये बयान कोई नयी जानकारी नहीं है - सब जानते हैं। ग़ालिब की इस क़ुबाZनी की ख़्वाहिश के बाद भी मोमिन का शेर मोमिन का शेर ही रहा। बरसों तक किसी ने भी इसे हाथ नहीं लगाया, लेकिन सन 66 में `लव इन टोक्यो´ के गीतकार से रहा नहीं गया। आपमें से बहुतों ने फिल्म का ये गीत सुना होगा, `ओ मेरे शाह-ए-खुबां, ओ मेरी जान-ए-जानां-ना/ तुम मेरे पास होते हो, कोई दूसरा नहीं होता´। गीत हसरत जयपुरी का है, संगीत दिया है शंकर-जयकिशन ने और इसे लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने फिल्म में अलग-अलग गाया है।

हम जिन्हें प्यार करते हैं, वे अक्सर हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी होते हैं, कैफी आज़मी होते हैं, मजरूह सुल्तानपुरी होते हैं और कई बार जावेद अख़्तर भी होते हैं। इनकी शायरी जो सिनेमा के सादा/रंगीन पर्दों से होती हुई हमारे जिस्म में लहू बन कर दौड़ने लगती है - उन तमाम शायरी में पूरी शिख्सयत को बदल डालने वाली ताक़त होती है। हम हिंदी के भोले लोगों की निर्दोष मोहब्बत ने कभी इनकी मौलिकता पर सवाल खड़ा नहीं होने दिया - लेकिन हिंदी ब्लॉग का क्या करें? वहां पता नहीं, कहां कहां की प्रतिभाएं पाये के कवियों से किस-किस जनम का बदला लेने उतर आयी हैं। अक्सर मैं एक ब्लॉग पर चुपके से गया और वहां मौजूद पाठ से रूबरू होकर खामोश क़दमों से लौट आया। आज सोचता हूं, सबके सामने ज़ाहिर कर ही दूं।

असद-उर-रहमान-िक़दवाई का ब्लॉग है, हमकलाम। असद एनडीटीवी के सीनियर पत्रकार हैं - भाषा के कारीगर हैं और शौिक़या लेकिन शानदार फोटोग्राफर हैं। हमकलाम में वे यही ज़िक्र करते पाये जाते हैं कि हिंदी फिल्मों के शायरों ने पर्दा के ईजाद से पहले के पुराने शायरों से क्या क्या लिया। इतना ही नहीं, पुराने पर्दे पर गाये गये गीत को ज़रा से रंग-रोगन के बाद नये पर्दे पर फिल्माये गये गीत का ज़िक्र भी हमकलाम में मिलता है। सब इत्मीनान थे कि तुलसी की चौपाइयों की तरह शायरी गांवों तक नहीं पहुंची है। लेकिन शायद उन्हें इलहाम नहीं था कि तीस-चालीस बरस बाद कोई राज़ खोल ही देगा। इसी साल जनवरी में शुरू हुए इस ब्लॉग में 19 गीतों का राज़ फाश किया गया है।

1945 में एक फिल्म आयी थी, `मन की जीत´। जोश मलीहाबाद का लिखा एक गीत है उसमें, `मोरे जोबना का देखो उधार पापी, मोरे जोबना का देखो उधार´। इसी में आगे की पंक्तियां हैं, `जैसे नÌी की मौज, जैसे तुकोZं की फौज, जैसे सुलगे से बम, जैसे बालक उधम... जैसे कोयल पुकार, जैसे हिरनी कुलेल, जैसे तूफान मेल... जैसे भंवरे की झूम, जैसे सावन की धूम, जैसे गाती फुहार´। 48 साल बाद सन 93 में `1942 ए लव स्टोरी´ का एक गीत आपके ज़ेहन में अभी ताज़ा ही होगा, `एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा... जैसे खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख़्वाब, जैसे उजली किरन, जैसे बन में हिरन, जैसे चांदनी रात, जैसे नरमी की बात, जैसे मंदिर में हो एक जलता दिया।´ तर्ज की भी तजुZमानी होती है और इतनी सफाई से कि वह मौलिक लगे, आप इस गीत में देख सकते हैं।

दाग़ देहलवी का शेर है, `तू है हरजाई तो अपना भी यही तौर सही, तू नहीं और सही और नहीं और सही!´ मजरूह सुल्तानपुरी ने इसी शेर की तर्ज पर 1960 में बनी फिल्म `तू नहीं और सही´ का टाइटल सांग लिखा था। इसी तरह मोइन अहसन जज़्बी की एक नज़्म है, `अपनी सोयी हुई दुनिया को जगा लूं तो चलूं´... राजा मेंहदी अली ख़ान ने 1965 में बनी फिल्म `नीला आकाश´ के लिए लगभग ऐसा ही एक गीत लिखा, `आिख़री गीत मोहब्बत का सुना लूं तो चलूं´! मीर वज़ीर अली सबा (1793.1855) ने लिखा, `तिरछी नज़रों से न देखो आशिक़-ए-दिलगीर को, कैसे तीरंदाज़ हो सीधा तो कर लो तीर को´। 1964 में `शबनम´ फिल्म के लिए जावेद अनवर ने लिखा, `ये तेरी सादगी ये तेरा बांकपन´। इसी गीत में एक मुखड़ा हूबहू सबा साहब की यही पंक्तियां हैं, `तिरछी नज़रों से न देखो आशिक़-ए-दिलगीर को, कैसे तीरंदाज़ हो सीधा तो कर लो तीर को... वो गया दिल मेरा... अलविदा-अलविदा।´

मज़ा आ रहा है, इसलिए हमकलाम से एक और उदाहरण देता हूं। मीर तक़ी मीर का एक शेर है, `इिब्तदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे आगे देखिए होता है क्या!´ हसरत जयपुरी ने इसी शेर में थोड़ी हेर-फेर की 1962 में बनी फिल्म `हरियाली और रास्ता´ के लिए, `इिब्तदा-ए-इश्क़ में हम सारी रात जागे, अल्ला जाने क्या होगा आगे... ओ मौला जाने क्या होगा आगे!´ लोग अपने अपने हिसाब से हिंदी फिल्मों के गीतकारों के ऐसे कारनामों की व्याख्या करते हुए मिलेंगे। कोई इन्हें साफ तौर पर नक़ल कहेगा, तो कोई इसे प्रेरणा लेकर लिखे गये गीतों की श्रेणी में रखेगा। कोई यह भी कहेगा कि अवचेतन में बैठे हुए शब्द-समूह कभी कभी खुद को मौलिक मानते हुए बाहर निकलते हैं - जबकि वे पहले से मौजूद होते हैं।

हमारी कोई समझदारी बन नहीं पायी है कि हम कैसे इन गीतों को देखें, जो पुरानी शायरी के कोटरों से कातर निगाहों से झांक रहे हैं। मैं आप सबसे मदद मांग रहा हूं, और असद-उर-रहमान िक़दवाई से भी, जो ऐसे गीतों के दस्तावेजीकरण में लगे हुए हैं।